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Wednesday, 15 August 2012

खबर पक्की है, देश तरक्की कर रहा है!


अवनीश सिंह
हिन्दुस्तान की आजादी को 65 साल से अधिक हो गया। अब हो गया तो हो गया, इसमें हम कर भी क्या सकते हैं। हम क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता है। आज 65 साल का हुआ है कल सौ का हो जाएगा। फिर भी देश तो वही रहेगा। हमारे राजनीतिक दलों के नेताओं की तरह देश भी अपनी जगह यथावत और स्थिर है। आज भी उत्तर में हमारी रखवाली पर्वत राज हिमालय कर रहा है, दक्षिण में सागर चरण धो ही रहा है। जब इतने सालों में न तो हिमालय की ऊंचाई में कोई कमीं आयी और न ही सागर की गहराई में, तो देश में परिवर्तन कैसे आ सकता है।
लेकिन फिर भी कुछ लोग मानने को तैयार ही नहीं है। वो अपनी ढपली पर सिर्फ एक ही राग अलाप रहे हैं कि इन वर्षों में देश ने बहुत तरक्की की है। राजधानी दिल्ली में भी यह अफवाह रही कि देश प्रगति कर रहा है और इस अफवाह का किसी ने खंडन नहीं किया। शायद यह खबर पक्की हो कि देश ने प्रगति की है। अब कहां से की है इसका पता लगाया जा रहा है। आजादी के इन वर्षों में अगर थोड़ा बहुत परिवर्तन हुआ है तो यह कि आदमी सस्ता और सामान मंहगे हुए हैं, शरीर सस्ता और कपड़े मंहगे हुए हैं। घरों की इज्जत होटलों की शरण में पहुंच गयी है। जिन मुद्दों पर घर के बंद कमरों में चर्चा होती थी वह अब टेलीवीजन चैनल के स्टूडियों में हो रही है। शिक्षितों की संख्या में बढ़ोतरी हुई तो बेरोजगारों की फौज भी खड़ी हो गयी। जहां लड़के हैं वहा पढ़ाने वाला नहीं है। जहां पढ़ाने वाले हैं वहां लड़के नहीं है और जहां दोनो हैं वहां पढ़ाई नहीं है। देश में योजनाएं लागू हुई तो आम आदमियों तक पहुंचने से पहले भ्रष्टाचार की शरण में चली गई। इस बीच अगर देश में कुछ यथावत है तो वह हैं नेता।
देश की जितनी दुर्गति आजादी के पहले अंग्रेजों ने नहीं की उससे अधिक दुर्गति देश के नेताओं ने कर दी। जैसे ही देश को आजादी मिली नेताओं ने महसूस किया कि खादी का कपड़ा मोटा, भद्दा और खुदरा होता है और बदन बहुत कोमल और नाजुक होता है। इसलिए नेताओं ने यह निर्णय लिया कि खादी को महीन किया जाये, रेशम किया जाए, टेरेलीन किया जाए। अंग्रेजों की जेल में नेताओं पर बहुत अत्याचार हुए थे। उन्हें पत्थर और सीमेंट की बेंचों पर सोने को मिला था, सो आजादी के बाद कपास का उत्पादन बढ़ाया गया, उसके गद्दे तकिये भरे गये और नेता उस पर विराज कर (टिक कर) देश की समस्याओं पर चिंतन करने लगे। देश में समस्याएं बहुत थी, नेता भी बहुत थे। समस्याएं बढ़ रही थी, नेता भी बढ़ रही थी। एक दिन ऐसा आया कि समस्याएं नेता हो गयी और नेता समस्या हो गये। फिर दोनो ही बढ़ने लगे।
आजादी से लेकर अब-तक यह समझने की कोशिश की जा रही है कि नेता के मायने क्या होते हैं? खुद नेता भी यही समझने की कोशिश कर रहें हैं कि नेता किसे कहते हैं? लेकिन देश की जनता ने नेता को ब्रह्मा की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा। कहा गया कि इस चर-अचर जगत में मनुष्य जितने रूपों में मिलता है नेता उससे जादा रूपों में मिलते है। कुछ बातें ऐसी हैं जो सार्वभौमिक सत्य की तरह अकाट्य है। जैसे नेता अमर है। वह मर नहीं सकता। उसके दोष बनें रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आयेंगे। जब-तक पक्षपात, परिवारवाद, निर्णयहीनता, ढीलापन, दोमुहापन, दिखावा, सस्ती आकांक्षा, लालच और भ्रष्टाचार कायम है तब-तक इस देश से नेताओं को कोई समाप्त नहीं कर सकता। नेता कायम रहेंगे, गरज यह कि कहीं भी किसी भी रूप में आपको नेता ही नजर आयेंगे। तथापि साठ साल हों या छह सौ साल नेता इस देश का और हमारा पीछा नहीं छोड़ने वाले हैं।
शरद जोशी ने तीन दशक पहले अपने एक लेख में कांग्रेस का जो गुणगान किया था वो आज भी इस राजनीतिक दल और उनके नेताओं पर फलीभूत हो रही है। “कांग्रेस हमारे देश पर तंबू की तरह तनी हुई है, गुब्बारे की तरह फैली हुई है, हवा की तरह सनसनाती रही है और बर्फ की तरह जमी है। इन सालों में कांग्रेस ने देश में कई कीर्तिमान बनाए, उसे सरकारी कर्मचारियों ने लिखा औऱ विधानसभा के सदस्यों ने पढ़ा। पोस्टरों, किताबों, सिनेमा की स्लाइडों, गरज यह देश के हर जर्रे-जर्रे पर कांग्रेस का नाम लिखा गया। रेडियों, टीवी, डाक्यूमेंटरी, सरकारी बैठकों और सम्मेलनों के साथ-साथ दसों दिशाओं में सिर्फ एक ही गूंज है वह है कांग्रेस…”
कांग्रेस की अनुगूंज आज भी देश के आम नागरिकों के मस्तिष्क में समय-समय पर गूंजती रहती है, कभी यह मंहगाई के रूप में तो कभी भ्रष्टाचार के रूप में। स्थिति यह है कि आज भ्रष्टाचार प्रजातंत्र की जड़ सींच रहा है। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन से जहां पूरे विश्व में भारत ने नाम कमाया वहीं इसमें हुए भ्रष्टाचार से उससे भी ज्यादा नाम नेताओं ने कमाया। इस बीच टूजी से संचार के क्षेत्र में जितनी क्रांति नहीं आयी होगी उससे अधिक क्रांति इसमें हुए घोटालों से राजनीति में आयी।
इतिहास साक्षी है कि कांग्रेस ने हमेसा संतुलन की नीति को बनाए रखा। जो कहा वह किया नहीं, जो किया वह बताया नहीं, जो बताया वह था ही नहीं और जो था वह गलत था। अहिंसा की नीति पर विश्वास किया और उस नीति को संतुलित किया लाठी और गोली से। सत्य की नीति पर चली, लेकिन सच बोलने वालों से सदा नाराज रही। पेड़ लगाने का आंदोलन चलाया औऱ ठेके पर जंगलों को साफ कराया। शराब के ठेके दिये, दारू के कारखाने खुलवाए; पर नशाबंदी का समर्थन करती रही। हिन्दी की हिमायती रही पर अंग्रेजी को चालू रखा। योजना बनायी तो लागू नहीं होने दिया। लागू की तो रोक लगा दीया और जब रोक दिया तो कभी चालू नहीं की। समस्याएं उठी तो कमीशन बैठाया, रिपोर्ट आयी तो कभी पढ़ा ही नहीं गया।
इस दौरान कांग्रेस ने संतुलन की कई नई परिभाषाओं को जन्म दिया। ऐसे में कहा जा सकता है कि कांग्रेस का इतिहास निरंतर संतुलन का इतिहास रहा है। समाजवाद की समर्थक रही, पर पूंजीवाद को कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। नारा दिया तो पूरा नहीं किया। प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ पब्लिक सेक्टर को खड़ा किया और पब्लिक सेक्टर के खिलाफ प्राइवेट सेक्टर को। जब कुछ समस्या आयी तो दोनों के बीच खुद खड़ी हो गयी। एक को बढ़ने नहीं दिया और दूसरे को घटने नहीं दिया।
आत्म निर्भरता पर जोर देते रहे और विदेशों से समर्थन मांगते रहे। “यूथ” को बढ़ावा दिया, बुड्ढों को टिकट दिया। जो जीता वह मुख्यमंत्री बना, जो हारा सो गवर्नर हो गया। जो केन्द्र में बेकार थे उसे राज्य में भेज दिया, जो राज्य में बेकार थे उसे केन्द्र में ले आये। जो दोनो जगह बेकार था उसे अंबेसेडर बना दिया। वह देश का प्रतिनिधित्व करने लगा। कांग्रेस ने कभी किसी को निराश नहीं किया। संतुलन की इंतिहा यह हुई कि उत्तर में जोर था दक्षिण में कमजोर थे। दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गये। जोर बना रहा कमजोर पड़ते गये। सच्चे अर्थों में कहा जाए तो कांग्रेस कार्य के अनुरूप व्यक्ति नहीं बल्कि व्यक्ति के अनुरूप कार्यों की हिमायती रही।

Friday, 7 October 2011

क्रांति पुरुष के निर्णय किसी तर्कशास्त्र या न्यायशास्त्र के आधार पर नहीं होते


एक अभूतपूर्व मंथन से हम सब और हमारा देश पिछले कई सालों से गुजर रहा है। इस वक्त, जबकि हम इस मंथन के एक पड़ाव पर आकर खड़े हैं, अवश्कता है इसके सिंहावलोकन की, कुछ निरिक्षण-परिक्षण, लेखा-जोखा और मुल्यांकन की। जनजीवन में समय-समय पर आने वाले ऐसे ज्वार और मंथन का सम्यक आंकलन कर सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा दिया गया। 1974 में गुजरात के छात्रों ने निर्णायक लड़ाई लड़कर यह साबित कर दिखाया कि भारत की छात्र-शक्ति, ‘समलक्ष्य’ और ‘समबोध’ के रास्ते पर आगे बढ़कर उन मूल्यों को स्थापित करने के लिये प्रभावी भूमिका अदा कर सकती है; जिनके लिये आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी।
क्रांति पुरुष के निर्णय किसी तर्कशास्त्र या न्यायशास्त्र के आधार पर नहीं होते। वे प्रायः सहजस्फूर्त होते हैं। ऐसे ही महापुरुष थे जयप्रकाश नारायण। पांच जून, 1975 की विशाल सभा में जयप्रकाश नारायण ने पहली बार ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ के दो शब्दों का उच्चारण किया। क्रान्ति शब्द नया नहीं था, लेकिन ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ नया था। सम्पूर्ण क्रान्ति जयप्रकाश नारायण का विचार व नारा था जिसका आह्वान उन्होने भ्रष्ट सत्ता को उखाड़ फेकने के लिये किया था। लोकनायक नें कहा कि सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियाँ शामिल है - राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रान्ति होती है। सम्पूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केन्द्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। जय प्रकाश नारायण जिनकी हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था। बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे।
आन्दोलन के दौरान सम्पूर्ण बिहार में कहीं भी जाने पर यह स्पष्ट दिख पड़ता था कि यह एक जन आन्दोलन है। छात्र, अध्यापक, वकील, कर्मचारी, दुकानदार- व्यापारी, बच्चे-किशोर-युवा-अधेड़-वृध्द, पुरुष-महिला, भूखे-नंगे मजदूर- किसान से लेकर धनवान, लेखक-कवि-साहित्यकार- पत्रकार-विद्वान और सभी वर्ग के लोगों का जे. पी. के आन्दोलन के प्रति सहानुभूति और सहयोग भाव था। पटना के गांधी मैदान पर लगभग पांच लाख लोगों की अति उत्साही भीड़ भरी जनसभा में देश की गिरती हालत, प्रशासनिक भ्रष्टचार, महंगाई, बेरोजगारी, अनुपयोगी शिक्षा पध्दति और प्रधान मंत्री द्वारा अपने ऊपर लगाये गए आरोपों का सविस्तार उत्तर देते हुए जयप्रकाश नारायण ने बेहद भावातिरेक में जनसाधारण का पहली बार ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ के लिये आह्वान किया।
राजनीतिक क्षेत्र में जे.पी. सत्ता के विकेन्द्रीकरण के प्रबल पक्षधर थे। वे चाहते थे कि प्रत्याशियों का चयन तथा राजसत्ता पर नियंत्रण जनता के द्वारा होना चाहिए। वे लोक चेतना के द्वारा जनता को जगाकर उसे लोकतंत्र का प्रहरी बनाना चाहते थे ताकि नीचे के कर्मचारी से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक सबके काम काज पर निगरानी रखी जा सके। वे चाहते थे कि जन प्रतिनिधियों को समय से पूर्व वापस बुलाने का अधिकार उस क्षेत्र की जनता को मिले ताकि जन प्रतिनिधियों को अपने निर्वाचन क्षेत्र के प्रति जवाबदेह बनाया जा सके।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में मार्च, 1974 में प्रारम्भ हुए बिहार छात्र आन्दोलन का दौर 15 महीने रहा। 18 महीने की इमरजेंसी आई। भारत की लोकसभा के चुनाव घोषित हुए, जिसे आन्दोलन समर्थकों ने जे. पी. के नेतृत्व में ‘लोकशाही बनाम तानाशाही’ को मुद्दा बनाकर लड़ा। इमरजेंसी की आकस्मिक घोषणा के फलस्वरूप ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ की संघर्ष-यात्रा ‘लोकतंत्र के रक्षा-अभियान’ में बदल गयी और सरकार को हटाना ही ‘सम्पूर्णता लक्ष्य’ बन गया। 1977 के चुनाव नतीजों ने सिध्द कर दिया कि जे. पी. के आन्दोलन के प्रति जनता की पूरी सहमति और स्वीकृति थी।
समता, स्वतंत्रता और भातृत्व की भावना के आधार पर लोक नायक जय प्रकाश नारायण नए समाज की रचना चाहते थे ताकि एक नए मनुष्य का निर्माण हो सके। वे क्रान्ति का सूत्रपात गांव से करना चाहते थे। उनका मानना था कि गांव की हर एक समस्या का चिन्तन ही सम्पूर्ण या समग्र क्रान्ति का पहलू है। इसलिए रचना, संघर्ष, शिक्षण और संगठन की चतुर्विधि प्रक्रिया से वो गांवों को बदलना चाहते थे। उनका कहना था कि जब गांव बदलेंगे तो शहर भी बदले बिना नहीं रहेंगे।
अवनीश सिंह

Tuesday, 13 September 2011

संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी


अवनीश सिंह
हिन्दी-दिवस की आप सभी को बधाई। १४ सितम्बर १९४९ को संविधान में हिन्दी को राष्ट्र भाषा स्वीकार किया गया था। वह दिन निश्चित ही स्वतंत्र भारत के लिए गौरवपूर्ण दिन था। एक लम्बा अन्तराल बीत गया है किन्तु आज तक हम हिन्दी को वह स्थान नहीं दिला पाए जिसकी वह अधिकारिणी है। अनेकता मे एकता का मंत्र को प्रतिपादित करने और हमारे देश को एकजुट बनाए रखने मे राष्ट्रभाषा से बडा योगदान न पहले किसी का था और न आगे किसी का होगा । अत: अपनी राष्ट्रभाषा पर हमे गर्व होना चाहिए। इसे अपनाने और हर जगह प्रयोग मे लाने से ही हम अपनी महान सांस्कृतिक विरासत को बचा सकते है।
संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है, ऐसा कथन डॉ. फादर कामिल बुल्के का है जो संस्कृत और हिन्दी की श्रेष्ठता को बताने के लिए सम्पूर्ण है। मगर आज हमारे देश मे देवभाषा और राष्ट्रभाषा की दिनो दिन दुर्गती होती जा रही है। या यूं कह ले की आज के समय मे मां और गृहिणी पर नौकरानी का प्रभाव बढता चला जा रहा है तो गलत नही होगा। लेकिन ऐसा क्यूं है ? आखिर वो कौन सी बात है जो हिन्दी को हर पल अंग्रेजी के आगे झुकने पर मजबूर कर देती है? भारत मे तो हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है। फिर हिन्दी मे बोलना या लिखना आज कल के दौर मे कम क्यूं होता जा रहा है ?
वर्तमान में हम अपनी भाषा और अपनी संस्कृति दोनो से ही दूर होते जा रहे हैं। एक विदेषी भाषा सीखना बुरा नहीं किन्तु अपनी पहचान खो बैठना बुरा है। अपनी भाषा से दूर होने के कारण हम अपनी संस्कृति से भी दूर हो रहे हैं। बल्कि यों कहें कि अपनी पहचान भी खो रहे हैं। हमारी दशा उस मूर्ख जैसी है जिसके पास पूर्वजों की बहुमूल्य विरासत है किन्तु वह उसका उपयोग नहीं कर पाता और भिखारी बना रहता है।
आज आप कही भी जा कर देख ले, एक अंग्रेजी बोलने वाले को बडी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है पर अगर उसी बात को कोई हिन्दी मे कह्ता है तो उसे उतना मान नही मिल पाता है। आज के समय मे नयी पीढी तो ये कहने मे जरा भी गुरेज नही करती की मेरी हिन्दी अच्छी नही है अत: मै अंग्रेजी मे ही बात करने या कहने को प्राथमिकता दूंगा। महात्मा गाँधी ने कहा था की अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है। मगर आज जितना प्रयास हिन्दी को बचाने के लिए किया जा रहा है, उससे कही ज्यादा जोर अंग्रेजी को बढाने के लिए हो रहा है। तो क्या अब ये मान लिया जाए की बिना अंग्रेजी बोले हम पूर्ण भारतीये नही कहे जा सकते ?
हमारी हिन्दी भाषा संसार की सर्वोत्तम भाषा है। इसकी वैग्यानिकता इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। जैसे बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है। तर्क संगत है। सुमधुर और सरल है। भूमावृति के कारण नित्य नवीन शब्दों को जन्म देने वाली है। एक-एक शब्द के कितने ही पर्याय वाची हैं। हर शब्द का सटीक प्रयोग होता है। अलग-अलग संदर्भों में एक ही शब्द नहीं, अलग-अलग शब्द हैं। समन्वय की प्रवृति के कारण दूसरी भाषाओं के शब्दों को जल्दी ही अपने में समा लेती है। माँ के समान बड़े प्यार से सबको अपने आँचल में समा लेती है। यही कारण है कि दूसरी भाषाओं के शब्द यहाँ आकर इसी के हो जाते हैं। फिर भी हम इसका लाभ नहीं उठा पा रहे। यह हमारा दुर्भाग्य ही तो है।
विडम्बना तो यह है कि परतन्त्रता में तो हिन्दी का विकास होता रहा किन्तु जब से देश स्वतन्त्र हुआ, हिन्दी का विकास ही रुक गया उल्टे उसकी दुर्गति होनी शुरू हो गई। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद शासन की नीति तुष्टिकरण होने के कारण हिन्दी को राष्ट्रभाषा के स्थान पर "राजभाषा" बना दिया गया। विदेश से प्रभावित शिक्षानीति ने हिन्दी को गौण बना कर अग्रेजी के महत्व को ही बढ़ाया। हिन्दी की शिक्षा धीरे-धीरे मात्र औपचारिकता बनते चली गई। दिनों-दिन अंग्रेजी माध्यम वाले कान्वेंट स्कूलों के प्रति मोह बढ़ते चला गया और आज हालत यह है कि अधिकांशतः लोग हिन्दी की शिक्षा से ही वंचित हैं।
भाषा के प्रचार के लिए प्रभावशाली माध्यम है मीडिया किन्तु टीबी के निजी चैनलों ने हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल करके हिन्दी को गर्त में और भी नीचे ढकेलना शुरू कर दिया और वहाँ प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों ने तो हिन्दी की चिन्दी करने में "सोने में सुहागे" का काम किया। इसी प्रकार से रोज पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्रों, जिनका प्रभाव लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है, ने भी वर्तनी तथा व्याकरण की गलतियों पर ध्यान देना बंद कर दिया और पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूषित होते चला गया।
मै ये बात अंग्रेजी का विरोध करने के लिए नही कह रहा हूं, बल्कि मेरी ये बात तो हिन्दी के उपर अंग्रेजी को प्राथमिकता देने पर केन्द्रीत है। आज हिन्दी बोलने वाले को निकृष्ट और अंग्रेजी बोलने वाले को उत्कृष्ट समझे जाने पर है। आज हमारा देश बदल तो बहुत गया है मगर इस बदलाव ने हमारी मूल पहचान को भी बदल कर रख दिया है। जो देश मानव-भाषा की जननी कही जाती है, आज उसी देश की भाषा को लिखने और बोलने मे, उसी देश के लोग अगर परहेज करने लगे तो फिर इससे बडा सांस्कारिक पतन और क्या कहा जा सकता है! आज अगर आप प्रवाहिक अंग्रेजी या फिर कामचलाऊ अंग्रेजी भी बोल सकते है तो आप नि:संदेह किसी अच्छे जगह पर नौकरी पाने के ज्यादा हकदार बन जाते है, उन लोगो के बनिस्पत जो बहुत अच्छी हिन्दी लिख और बोल दोनो सकते है।
वाल्टर चेनिंग ने विदेशी भाषा का पुरजोर विरोध करते हुए कहा था की विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। तो क्या भारत आज भी अंग्रेजों की सांस्कृतिक दासता का शिकार है ? आज तो भारत मे ज्यादातर राजकाज और शिक्षा की भाषा अंग्रेजी ही नजर आती है। तो इसका अर्थ तो यही हुआ की न की आज भी हम सम्पूर्ण आजाद नही हुए है । बडी शर्म आती है उन लोगों को देखकर जो अपनी हिन्दी को अपनाने मे शर्म महसूस करते है । मै दावे के साथ ये कह सकता हूं की दुनिया की कोई भी ऐसी बात नही बनी जिसे हम हिन्दी मे कह नही सकते या फिर समझा नही सकते। फिर क्यूं हर बात के लिए अंग्रेजी का मुंह ताकते है हम हिन्दुस्तानी ?
आज हम हर स्तर पर आधुनिक तो होते जा रहे है लेकिन साथ साथ हम उन मूल्यों को भी खोते जा रहे है जो हमारे देश की एक विशिष्ट पहचान, दुनिया के सामने प्रस्तुत करती थी। आज के समय मे हिन्दी का अपमान करने पर तुले हम भारतीयों को एक बार तो ये जरूर सोचना चाहिए की क्या दुनिया का कोई भी ऐसा देश है जिसकी मूल भाषा अंग्रेजी हो और उस देश के लोग उसे ना बोलकर हिन्दी को अपनाने लगे हों । भाषा त्यागने का उदाहरण भारत से ज्यादा शायद और कही देखने को ना मिले।
कही एक बहुत सटीक बात कही गई है की सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिन्दी महानतम स्थान रखती है। आज उस महान हिन्दी रूपी बिन्दी को सर से उतारने पर तुले हम भारतीयों को एक बार रूक कर ये देखना पडेगा कि हमारा ये कृत्य हमारी आने वाले पीढी को क्या देकर जाएगा । कही ऐसा ना हो की आने वाली पीढी अपनी राष्ट्र भाषाई निर्धनता के लिए हमे कभी माफ ना करे। देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को पहले भी अपनाया गया था और भविष्य मे भी इसे बरकरार रखने की आवश्यक्ता है । जो भाषा जन्म से ही अपने पैरों पर खडी मानी गई है जरुरत है उसे अपने साथ लेकर चलने की क्यूंकी इसी से हम अपने चिर काल से विकसित संस्कारों की छ्टा पूरी दुनिया मे बिखेर सकते है।
हिन्दी हमेशा उन्नत रहे फले फूले और हिन्दुस्तानियों के सर पर बिन्दी बन चमकती रहे की आशा के साथ मैथिलीशरण गुप्त की कुछ पंक्तियों से इस लेख का समापन करता हूं – “मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती । भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती ”।