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Sunday, 21 October 2012

सेक्स और सियासत का कॉकटेल


राजनीति को सत्ता, सुंदरी व सियासत का खेल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इसका ताजा उदाहरण अगस्त महीने के पहले  सप्ताह में लगातार दो मर्डर मिस्ट्री, जिसने सियासी गलियारों में सनसनी पैदा कर दी है। देखा जाये तो यह दोनों मामले हरियाणा से जुड़े हैं और दोनों के केन्द्र बिन्दु में कांग्रेस के बड़े नेताओं के नाम शामिल हैं। कुछ महीनें पहले राजस्थान में घटित भवरी देवी हत्याकांड के छीटों के दाग कांग्रेस के दामन से धुले भी नहीं थे कि हरियाणा सरकार के मंत्री गोपाल कांडा ने फिर से पार्टी का दामन को दागदार कर दिया।
गौरतलब है कि जब-जब सेक्स और सियासत का कॉकटेल हुआ है, तब-तब हंगामा बरपा है। किसी न किसी महिला ने अपनी जान गंवाई है। एक नेता से प्यार करने का ऐसा अंजाम होगा शायद किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। अभी दो दिन पहले एमडीएलआर एयरलाइंस की पूर्व महानिदेशक गीतिका शर्मा की अशोक बिहार स्थित अपने ही घर में आत्महत्या का मामला सामने आया। इस मामले में गीतिका ने अपने सुसाइट नोट में हरियाणा सरकार के गृह राज्य एवं स्थानीय निकाय मंत्री गोपाल कांडा को मौत का जिम्मेदार बताया है। इस घटना की जांच अभी चल ही रही थी कि हरियाणा की पूर्व उप-महाधिवक्ता फिजा उर्फ अनुराधा बाली की उनके चंडीगढ़ स्थित घर से लाश मिलने से सनसनी फैल गई है।
शायद ही किसी ने सोचा होगा कि हरियाणा के पूर्व डिप्टी सीएम चंद्रमोहन के प्यार में पागल अनुराधा बाली उनसे शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन भी कर लेगी। लेकिन उन्होंने ऐसा किया और फिजा बन गई। इधर चंद्रमोहन ने भी इस्लाम स्वीकार कर अपना नाम चांद मोहम्मद कर लिया। दोनों का निकाह हुआ। लेकिन विवाह के बाद इनके बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं रहा। 7 दिसंबर 2009 को दोनों ने सार्वजनिक रूप से माना था कि उन्होंने धर्मपरिवर्तन करके इस्लामिक कायदे से निकाह कर लिया है। निकाह के 20 दिनों बाद ही चांद ने फिजा को छोड़ दिया और अपनी पहली पत्नी के पास लौट गए। चंद्रमोहन पहले से ही शादीशुदा थे। उनके दो बच्चे भी हैं। अनुराधा वकील थी और मोहाली के एक बिजनेसमैन से उनका तलाक हो चुका था।
फिजा ने चांद के खिलाफ पुलिस शिकायत भी दर्ज करवाई। लेकिन हरियाणा पुलिस द्वारा चांद को क्लीन चिट दे दी गई। इस बीच एक इंटरव्यू में फिजा का कहना था कि चांद उनका इस्तेमाल केवल सेक्स के लिए करते थे। फिजा ने कहा था, "अगर चांद मुझसे सच्चा प्यार करते तो 20 दिनों में मुझे नहीं छोड़ देते। जब उन्हें लगा कि वो मुझसे आसानी से शारीरिक संबंध नहीं बना पा रहे हैं तो उन्होंने मुझसे शादी करने को कहा।"
चंद्रमोहन द्वारा ऐसा किए जाने से भजनलाल जहां काफी नाराज थे, वहीं उनके रिश्तेदार भी पूरी कोशिश कर रहे थे कि चंद्रमोहन फिजा को छोड़ वापस घर लौट आएं। आखिरकार उनकी कोशिशें कामयाब हुईं और चंद्रमोहन उर्फ चांद मोहम्मद अचानक फिजा को बिना कुछ बताए लंदन चले गए, जहां उनके बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। बाद में मीडिया से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे अल्कोहलिज्म का इलाज कराने लंदन गए थे। वापस आने के बाद वे पूरे धार्मिक रीति-रिवाज के साथ विश्नोई समाज में फिर दाखिल हुए और अपनी पत्नी के साथ रहने लगे। लेकिन दबाव बनाए जाने के बाद कुछ ही दिनों में वे फिजा के साथ उसके घर पर रहने चले गए। इस दौरान इनकी अश्लील हरकतें मीडिया की सुर्खियों में छाई रहीं। घर और बाहर, खुलेआम आपत्तिजनक स्थितियों में सामने आने के कारण इन्हें मुहल्ले के लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा। लेकिन दोनों के साथ रहने का यह सिलसिला लंबे समय तक नहीं चल पाया और चंद्रमोहन फिर फिजा को उसके सूरत-ए-हाल पर छोड़ अपने घर लौट आए। इसके बाद इन दोनों के बारे में शायद ही कोई खबर आई हो। इस बीच चन्द्रमोहन भले ही आरामतलब जिंदगी जी रहे हैं, लेकिन उनके झूठे प्रेम जाल में फंसी अनुराधा बाली के जीवन का दुखद अंत हो गया।
सियासत में ऐसे कई औऱ भी उदाहरण हैं जिनसे खद्दर दागदार हुई है। राजस्थान सरकार के पूर्व मंत्री व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महिपाल मदेरणा का नर्स भंवरी देवी के साथ अवैध संबंधों की बात सामने आने के बाद भवरी की हत्या ने राजनीति, अतिमहत्त्वाकांक्षा और लालच की एक औऱ दास्तान लिख दी। बात चाहे भोपाल के शेहला मसूद हत्याकांड की हो या उत्तर प्रदेश के मधुमिता हत्याकांड की सभी के तार राजनीतिक गलियारों से होकर गुजरे हैं। पिछले साल भोपाल में आरटीआई एक्टिविस्ट शेहला मसूद की हत्या कर दी गई। इस मामले में सीबीआई ने शेहला के दोस्त जाहिदा परवेज को गिरफ्तार कर लिया।
जाहिदा पर आरोप है कि उसे अपने पति और शेहला के बीच अवैध संबंधों को लेकर शक था। इसी आधार पर उसने सुपारी देकर अपनी दोस्त की हत्या करवा दी। लेकिन इस हत्याकांड में राजनीतिक मोड़ उस समय आया जब केश की जांच कर रही सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में कहा कि हत्या में शामिल होने की आरोपी जाहिदा परवेज के भाजपा नेता ध्रुव नारायण से जिस्मानी रिश्ते थे। 'फर्स्ट पोस्ट' वेबसाइट ने चार्जशीट के आधार पर बताया कि जाहिदा ध्रुव नारायण के प्यार में इतनी पागल थी कि उसने अपने दफ्तर में विधायक के साथ सेक्स करते हुए वीडियो भी बना लिए था। यह वीडियो सीबीआई के कब्जे में हैं। यह मर्डर केस पूरी तरह से सेक्स और पॉलिटिक्स के बीच उलझा हुआ है।
ऐसा ही मामला उत्तर प्रदेश में भी देखा गया। फैजाबाद की रहने वाली शशि लॉ की स्टूडेंट थी। शशि आनंद सेन के करीबी हो गई थी। वह राजनीति में आना चाहती थी। इसलिए शार्टकट के रूप में उसने आनंद सेन को चुना। शशि के पिता खुद एक राजनीतिक कार्यकर्ता थे। आनंद सेन ने भी उसकी आंखों में बसे इस ख्बाव को देख लिया था। फिर शुरू हुआ वायदों का सिलसिला। वायदे बढ़ते गए, जिस्मानी दूरियां मिटती गईं। 22 अक्टूबर 2007 को शशि गायब हुई। लंबी छानबीन और धड़पकड़ के बाद पता चला कि वह इस दुनिया से जा चुकी थी। उसकी हत्या हो गई थी। एक दशक पहले मधुमिता भी सियासत की भेंट चढ़ गयी। मधुमिता एक कवयित्री थी। उस समय यूपी के मंत्री अमरमणि से उनका प्यार परवान चढ़ गया। दोनों गुपचुप मिलने लगे। यह बात मंत्री की पत्नी को रास नहीं आई। उसने मधुमिता की हत्या 2003 में करा दी। फिलहाल अमरमणि जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं।
अवनीश सिंह
हिन्दुस्थान समाचार
नई दिल्ली -

Wednesday, 15 August 2012

खबर पक्की है, देश तरक्की कर रहा है!


अवनीश सिंह
हिन्दुस्तान की आजादी को 65 साल से अधिक हो गया। अब हो गया तो हो गया, इसमें हम कर भी क्या सकते हैं। हम क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता है। आज 65 साल का हुआ है कल सौ का हो जाएगा। फिर भी देश तो वही रहेगा। हमारे राजनीतिक दलों के नेताओं की तरह देश भी अपनी जगह यथावत और स्थिर है। आज भी उत्तर में हमारी रखवाली पर्वत राज हिमालय कर रहा है, दक्षिण में सागर चरण धो ही रहा है। जब इतने सालों में न तो हिमालय की ऊंचाई में कोई कमीं आयी और न ही सागर की गहराई में, तो देश में परिवर्तन कैसे आ सकता है।
लेकिन फिर भी कुछ लोग मानने को तैयार ही नहीं है। वो अपनी ढपली पर सिर्फ एक ही राग अलाप रहे हैं कि इन वर्षों में देश ने बहुत तरक्की की है। राजधानी दिल्ली में भी यह अफवाह रही कि देश प्रगति कर रहा है और इस अफवाह का किसी ने खंडन नहीं किया। शायद यह खबर पक्की हो कि देश ने प्रगति की है। अब कहां से की है इसका पता लगाया जा रहा है। आजादी के इन वर्षों में अगर थोड़ा बहुत परिवर्तन हुआ है तो यह कि आदमी सस्ता और सामान मंहगे हुए हैं, शरीर सस्ता और कपड़े मंहगे हुए हैं। घरों की इज्जत होटलों की शरण में पहुंच गयी है। जिन मुद्दों पर घर के बंद कमरों में चर्चा होती थी वह अब टेलीवीजन चैनल के स्टूडियों में हो रही है। शिक्षितों की संख्या में बढ़ोतरी हुई तो बेरोजगारों की फौज भी खड़ी हो गयी। जहां लड़के हैं वहा पढ़ाने वाला नहीं है। जहां पढ़ाने वाले हैं वहां लड़के नहीं है और जहां दोनो हैं वहां पढ़ाई नहीं है। देश में योजनाएं लागू हुई तो आम आदमियों तक पहुंचने से पहले भ्रष्टाचार की शरण में चली गई। इस बीच अगर देश में कुछ यथावत है तो वह हैं नेता।
देश की जितनी दुर्गति आजादी के पहले अंग्रेजों ने नहीं की उससे अधिक दुर्गति देश के नेताओं ने कर दी। जैसे ही देश को आजादी मिली नेताओं ने महसूस किया कि खादी का कपड़ा मोटा, भद्दा और खुदरा होता है और बदन बहुत कोमल और नाजुक होता है। इसलिए नेताओं ने यह निर्णय लिया कि खादी को महीन किया जाये, रेशम किया जाए, टेरेलीन किया जाए। अंग्रेजों की जेल में नेताओं पर बहुत अत्याचार हुए थे। उन्हें पत्थर और सीमेंट की बेंचों पर सोने को मिला था, सो आजादी के बाद कपास का उत्पादन बढ़ाया गया, उसके गद्दे तकिये भरे गये और नेता उस पर विराज कर (टिक कर) देश की समस्याओं पर चिंतन करने लगे। देश में समस्याएं बहुत थी, नेता भी बहुत थे। समस्याएं बढ़ रही थी, नेता भी बढ़ रही थी। एक दिन ऐसा आया कि समस्याएं नेता हो गयी और नेता समस्या हो गये। फिर दोनो ही बढ़ने लगे।
आजादी से लेकर अब-तक यह समझने की कोशिश की जा रही है कि नेता के मायने क्या होते हैं? खुद नेता भी यही समझने की कोशिश कर रहें हैं कि नेता किसे कहते हैं? लेकिन देश की जनता ने नेता को ब्रह्मा की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा। कहा गया कि इस चर-अचर जगत में मनुष्य जितने रूपों में मिलता है नेता उससे जादा रूपों में मिलते है। कुछ बातें ऐसी हैं जो सार्वभौमिक सत्य की तरह अकाट्य है। जैसे नेता अमर है। वह मर नहीं सकता। उसके दोष बनें रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आयेंगे। जब-तक पक्षपात, परिवारवाद, निर्णयहीनता, ढीलापन, दोमुहापन, दिखावा, सस्ती आकांक्षा, लालच और भ्रष्टाचार कायम है तब-तक इस देश से नेताओं को कोई समाप्त नहीं कर सकता। नेता कायम रहेंगे, गरज यह कि कहीं भी किसी भी रूप में आपको नेता ही नजर आयेंगे। तथापि साठ साल हों या छह सौ साल नेता इस देश का और हमारा पीछा नहीं छोड़ने वाले हैं।
शरद जोशी ने तीन दशक पहले अपने एक लेख में कांग्रेस का जो गुणगान किया था वो आज भी इस राजनीतिक दल और उनके नेताओं पर फलीभूत हो रही है। “कांग्रेस हमारे देश पर तंबू की तरह तनी हुई है, गुब्बारे की तरह फैली हुई है, हवा की तरह सनसनाती रही है और बर्फ की तरह जमी है। इन सालों में कांग्रेस ने देश में कई कीर्तिमान बनाए, उसे सरकारी कर्मचारियों ने लिखा औऱ विधानसभा के सदस्यों ने पढ़ा। पोस्टरों, किताबों, सिनेमा की स्लाइडों, गरज यह देश के हर जर्रे-जर्रे पर कांग्रेस का नाम लिखा गया। रेडियों, टीवी, डाक्यूमेंटरी, सरकारी बैठकों और सम्मेलनों के साथ-साथ दसों दिशाओं में सिर्फ एक ही गूंज है वह है कांग्रेस…”
कांग्रेस की अनुगूंज आज भी देश के आम नागरिकों के मस्तिष्क में समय-समय पर गूंजती रहती है, कभी यह मंहगाई के रूप में तो कभी भ्रष्टाचार के रूप में। स्थिति यह है कि आज भ्रष्टाचार प्रजातंत्र की जड़ सींच रहा है। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन से जहां पूरे विश्व में भारत ने नाम कमाया वहीं इसमें हुए भ्रष्टाचार से उससे भी ज्यादा नाम नेताओं ने कमाया। इस बीच टूजी से संचार के क्षेत्र में जितनी क्रांति नहीं आयी होगी उससे अधिक क्रांति इसमें हुए घोटालों से राजनीति में आयी।
इतिहास साक्षी है कि कांग्रेस ने हमेसा संतुलन की नीति को बनाए रखा। जो कहा वह किया नहीं, जो किया वह बताया नहीं, जो बताया वह था ही नहीं और जो था वह गलत था। अहिंसा की नीति पर विश्वास किया और उस नीति को संतुलित किया लाठी और गोली से। सत्य की नीति पर चली, लेकिन सच बोलने वालों से सदा नाराज रही। पेड़ लगाने का आंदोलन चलाया औऱ ठेके पर जंगलों को साफ कराया। शराब के ठेके दिये, दारू के कारखाने खुलवाए; पर नशाबंदी का समर्थन करती रही। हिन्दी की हिमायती रही पर अंग्रेजी को चालू रखा। योजना बनायी तो लागू नहीं होने दिया। लागू की तो रोक लगा दीया और जब रोक दिया तो कभी चालू नहीं की। समस्याएं उठी तो कमीशन बैठाया, रिपोर्ट आयी तो कभी पढ़ा ही नहीं गया।
इस दौरान कांग्रेस ने संतुलन की कई नई परिभाषाओं को जन्म दिया। ऐसे में कहा जा सकता है कि कांग्रेस का इतिहास निरंतर संतुलन का इतिहास रहा है। समाजवाद की समर्थक रही, पर पूंजीवाद को कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। नारा दिया तो पूरा नहीं किया। प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ पब्लिक सेक्टर को खड़ा किया और पब्लिक सेक्टर के खिलाफ प्राइवेट सेक्टर को। जब कुछ समस्या आयी तो दोनों के बीच खुद खड़ी हो गयी। एक को बढ़ने नहीं दिया और दूसरे को घटने नहीं दिया।
आत्म निर्भरता पर जोर देते रहे और विदेशों से समर्थन मांगते रहे। “यूथ” को बढ़ावा दिया, बुड्ढों को टिकट दिया। जो जीता वह मुख्यमंत्री बना, जो हारा सो गवर्नर हो गया। जो केन्द्र में बेकार थे उसे राज्य में भेज दिया, जो राज्य में बेकार थे उसे केन्द्र में ले आये। जो दोनो जगह बेकार था उसे अंबेसेडर बना दिया। वह देश का प्रतिनिधित्व करने लगा। कांग्रेस ने कभी किसी को निराश नहीं किया। संतुलन की इंतिहा यह हुई कि उत्तर में जोर था दक्षिण में कमजोर थे। दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गये। जोर बना रहा कमजोर पड़ते गये। सच्चे अर्थों में कहा जाए तो कांग्रेस कार्य के अनुरूप व्यक्ति नहीं बल्कि व्यक्ति के अनुरूप कार्यों की हिमायती रही।

Friday, 10 February 2012

भ्रष्टाचार का शिष्टाचार

नई दिल्ली, 02 फरवरी । सर्वोच्च न्यायालय ने 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़े मुद्दे पर फैसला सुनाने के साथ ही गुरुवार को सरकार की साख पर करारा तमाचा जड़ दिया। पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा पर मुकदमा चलाने की मंजूरी दबाए रखने के मामले में किरकिरी झेल चुकी सरकार को शीर्ष अदालत ने बड़ा झटका देते हुए राजा के कार्यकाल में दिए गए स्पेक्ट्रम के 122 लाइसेंसों को गैरकानूनी और असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया। सरकार की आवंटन नीति को बेजा ठहराते हुए अदालत ने स्पेक्ट्रम की हिस्सेदारी बेच कर मोटा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों एतिसलात, यूनिटेक व टाटा टेली पर पांच-पांच करोड़ तथा लूप टेलीकाम, एसटेल, एलायंज इन्फ्राटेक तथा सिस्तेमा श्याम पर 50-50 लाख का जुर्माना भी ठोंका।
जस्टिस एके गांगुली के लिए गुरुवार का दिन भले ही कोर्ट में आखिरी दिन रहा मगर उनका यह फैसला ऐतिहासिक बन गया है। इससे न सिर्फ कॉरपोरेट कानून प्रभावित होगा, बल्कि लंबे समय में इसका असर सरकार की नीति और कॉरपोरेट के कामकाज पर भी होगा। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला केंद्रीय सत्ता के लिए एक और शर्मिदगी का क्षण है।
यह महज दुर्योग नहीं हो सकता कि उसके सामने ऐसे क्षण बार-बार आ रहे हैं। अभी दो दिन पहले ही सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री कार्यालय को कठघरे में खड़ा किया था। खास बात यह है कि उस फैसले के केंद्र में भी पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा ही थे और ताजा फैसले में भी। 2जी स्पेक्ट्रम के सभी 122 लाइसेंस अवैध करार देकर उन्हें रद करने के शीर्ष अदालत के फैसले ने यह साबित कर दिया कि जब घोटालेबाज ए.राजा कुछ कारपोरेट घरानों से मिलकर मनमानी करने में लगे हुए थे तब केंद्रीय सत्ता सोई हुई थी। इससे साफ है कि स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही है और इसमें घोटाला हुआ है।


इस घोटाले के लिए संप्रग सरकार की सामूहिक विफलता को इंगित करना सर्वोच्च न्यायालय नहीं भूला। इसका आशय है कि घोटाले के लिए पूरी सरकार जिम्मेदार है और वह अपने आपको इससे अलग नहीं कर सकती। दुख, क्षोभ और लज्जा की बात यह रही कि जब उसे झकझोर कर इस महाघोटाले से अवगत कराया गया तो उसने शुतुरमुर्गी आचरण का परिचय दिया। इतना ही नहीं उसकी ओर से हरसंभव तरीके से राजा का बचाव करने की भी कोशिश की गई।
यह सर्वविदित है कि सरकारी ठेके और लाइसेंस देने में भ्रष्ट तरीके अपनाए जाते हैं, कानून तोड़े जाते हैं, पक्षपात होता है और आमतौर पर जो कंपनी ज्यादा देती है, उसे ज्यादा मिलता है। गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय ने 122 टेलीकॉम लाइसेंस इसलिए रद्द कर दिए, क्योंकि इन्हें जारी करते समय नीतियों का ठीक पालन नहीं हुआ और भ्रष्ट मंत्री ने रिश्वत लेकर लाइसेंस बांटे। पहली बार सर्वोच्च न्यायालय ने किसी नीति और उसकी खामियों पर सीधी टिप्पणी की है। कोर्ट ने 'पहले आओ-पहले पाओ'नीति को गलत और घातक करार दिया है। रद्द होने वाले लाइसेंस को लेकर बहुत लोगों को चिंता है, और इसके दूरगामी प्रभाव भी होंगे।
अगर लाइसेंस आवंटन में नीति का सही तरीके से पालन नहीं होता है तो भविष्य में यह फैसला लाइसेंस रद्द करने का आधार बन सकता है। आने वाले वर्षों में अनेक मामलों में इस फैसले को नजीर बनाकर उपयोग किया जाएगा। कानून की थोड़ी जानकारी रखने वाला भी यह समझ सकता है कि भविष्य में बड़े कॉन्ट्रैक्ट रद्द हो सकते हैं। खासकर अगर नीति का सही-सही पालन नहीं हुआ हो तो। फ्रॉड के आधार पर लाइसेंस रद्द करने के कई फैसले हुए हैं।
यह स्वान टेलीकॉम जैसी कंपनियों को सिर्फ लाइसेंस खरीद और बेचकर मुनाफा कमाने से रोकेगा। इस कंपनी ने 1,537 करोड़ रुपये में लाइसेंस खरीदा और एतिसालात को 4,500 करोड़ में हिस्सेदारी बेच दी। यह फैसला राजनीतिज्ञों को भी नीतियों के गलत इस्तेमाल या उनकी गलत व्याख्या करने से रोकेगा। नीति पर अमल हो, इस पर अब नेताओं से ज्यादा कॉरपोरेट्स को चिंता होगी। दूरसंचार मंत्री के पद पर रहते हुए ए. राजा ने कंपनियों को आशय पत्र जमा करने के लिए सिर्फ 45 मिनट का समय दिया। यही नहीं, 1600 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी के लिए भी उन्हें कुछ घंटे का ही वक्त मिला।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण समय वह था जब खुद प्रधानमंत्री ने राजा को क्लीनचिट देते हुए किसी तरह के घोटाले से इंकार किया। इसके बाद जब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने घोटाले पर मुहर लगा दी तो सच को स्वीकार करने के बजाय इस संवैधानिक संस्था की ही खिल्ली उड़ाने का काम किया गया। यह काम सरकार ने भी किया और उसका नेतृत्व करने वाली कांग्रेस ने भी। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद बुरी तरह शर्मसार सरकार के पास अपनी सफाई में कहने के लिए कुछ भी नहीं है, लेकिन वह अभी भी खुद के सही होने और अपनी सेहत पर फर्क न पड़ने का दंभ भर रही है। इससे तो यही लगता है कि उसने यह ठान लिया है कि कुछ भी हो जाए वह सच का सामना करने के लिए तैयार नहीं होगी। यह और कुछ नहीं बल्कि बची-खुची साख गंवाने का सुनिश्चित रास्ता है।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद सारी गलती राजा पर थोपने के साथ ही स्पेक्ट्रम आवंटन की गलत नीति बनाने के लिए जिस तरह भाजपा से माफी मांगने के लिए कहा गया वह हास्यास्पद भी है और केंद्रीय सत्ता के अहंकारी रवैये का नमूना। केंद्र सरकार जानबूझकर इस तथ्य की अनदेखी कर रही है कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में राजग सरकार की पहले आओ पहले पाओ नीति को त्रुटिपूर्ण करार देने के बावजूद संप्रग सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि 2008 के पहले के लाइसेंस भी खारिज किए जाने चाहिए।
यह समझना कठिन है कि केंद्र सरकार ने बदली हुई परिस्थितियों में स्पेक्ट्रम आवंटन की नीति को दुरुस्त करने की जरूरत क्यों नहीं समझी और वह भी तब जब इसकी मांग भी की जा रही थी? क्या राजग शासन द्वारा तय की गई नीति कोई पत्थर की लकीर थी? मौजूदा दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल की मानें तो सारी गड़बड़ी राजा ने की। उन्होंने ही रातोंरात नियम बदले और जब वह ऐसा कर रहे थे तो न तो वित्तमंत्री का उन पर कोई जोर चल रहा था और न ही प्रधानमंत्री का। क्या यह कहने की कोशिश की जा रही है कि दूरसंचार मंत्री के रूप में राजा प्रधानमंत्री और कैबिनेट से भी अधिक शक्तिशाली थे? नि:संदेह ये कुतर्क सच्चाई स्वीकार करने से बचने के लिए दिए जा रहे हैं।

जहां तक प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग का संबंध है तो यह प्रत्येक लोकतांत्रिक देश में विपक्ष का अधिकार होता है कि वह सरकार के कामकाज की समीक्षा करे और उसके गलत कामों की निंदा करे और हरसंभव तरीके से सरकार पर दबाव बनाए,लेकिन यहां सवाल पूरे देश की जनता और संसद के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के प्रति सरकार की जिम्मेदारी का भी है, जिसे हर हाल में पूरा किया जाना होगा और उस पर खरा उतरना होगा। कम से कम 2जी मामले में सरकार इन पैमानों पर खरी नहीं उतरी है। इससे न केवल सरकार की किरकिरी हो रही है, बल्कि उसके साथ-साथ पूरे देश की छवि भी अंतरराष्ट्रीय जगत में दांव पर लग रही है।
यह एक चिंता की बात है कि देश की सरकार ही देश के लिए समस्या बन रही है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एक नजीर के रूप में लिया जाना चाहिए और आगे के लिए सबक लेते हुए एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आम जनता के लिए बहुत ही राहत लेकर आया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए यह मील का पत्थर साबित होगा। आखिर केंद्र सरकार और उसके रणनीतिकारों को अपनी भूल स्वीकार करने में संकोच क्यों हो रहा है?

Friday, 17 June 2011

'सेकुलर संजीवनी' की एक खुराक


कांग्रेसियों ने खोजा सेकुलर बनाने का नया तरीका

जिस तरह ‘हाजी की उपाधि पाने के लिए हज यात्रा करना जरुरी है उसी तरह खुद को सेकुलर साबित करने के लिए आज़मगढ़ जिले के संजरपुर की यात्रा भी आवश्यक मानी जाती रही है। लेकिन हाल-फिलहाल में कांग्रेसियों ने इन तर्कों को झुठलाते हुए सेकुलर बनने के लिए एक नया तरीका खोज निकला है।

अगर किसी बुद्धजीवी नेता को सेकुलर बनना है तो उसे दस जनपथ जाकर मुफ्त में बट रहे दिग्ग्विजय सिंह और मनीष तिवारी के फार्मेसी से निकली 'सेकुलर संजीवनी' की एक खुराक लेनी है। शर्तिया सेकुलर बनाने का दावा करने वाले इस ‘संजीवनी' की एक खुराक लेते ही आप के हाव-भाव, भाषा-बोली सब बदल जाएगी। संघ को गरियाना हो या भाजपा को लतियाना हो.... दोनों काम इस ‘संजीवनी' को लेते ही आप अपने आप करने लगेंगे।

कुछ सेकुलरों ने तो इसके कुछ अन्य लाभ भी बताया है। नाम न छापने की बात कहते हुए मेरे एक कांग्रेसी मित्र ने बताया कि इस खुराक के लेते ही उनके अन्दर कुछ कुत्तों वाले लक्षण भी देखने को मिले। उन्होंने बताया कि जबसे उन्होंने दस जनपथ जाकर इस खुराक को लिया है तब से वो सोनिया भक्त हो गएँ है और उनकी स्वामिभक्ति इटली के प्रति अचानक बढ़ गयी है। सदैव खामोश रहने वाले मेरे कांग्रेसी मित्र अब तो लगातार किसी पर भी घंटों भौंक लेते है।

यह तो साबित हो चूका है कि अब हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की प्रखर अभिव्यक्ति को कुचलकर ही सेकुलर की पगडंडी तैयार की जा सकती है। अगर फिर भी यकीं न आये तो एक बार दिल्ली के 10 जनपथ से होकर आइये। यकीन नहीं आये तो दो दिन पूर्व ही दस जनपथ से खुराक लेकर लौटे कांग्रेस महासचिव और पार्टी के छत्तीसगढ़ मामलों के प्रभारी बी. के हरिप्रसाद से पूछ सकते हैं।

सेकुलर की खुराक लेकर लौटे हरिप्रसाद पर दस जनपद की महारानी मायनो के जादू से युक्त संजीवनी ने इस कदर असर दिखाया कि भ्रष्टाचार और काले धन को लेकर जारी बहस के बीच जुबानी जंग में दिग्गी राजा से भी एक कदम आगे निकले। नितिन गडकरी द्वारा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को मुन्नी से भी ज्यादा बदनाम और धर्म निरपेक्षता के मामले में ओसामा बिन लादेन की औलाद बताने से भड़की कांग्रेस ने अब भाजपा पर पलटवार के लिए ऐसे सूरमाओं को इस संजीवनी को पिलाकर मैदान में उतार दिया है।

गडकरी के बयान का उत्तर देने के लिए मैदान में उतरे इस सेकुलर कांग्रेसी हरिप्रसाद का नाम देश ने पिछली दफ़ा कब सुना था? सोचने पर भी याद नहीं आएगा...ये है इस सेकुलर संजीवनी का कमाल। जब कभी बिना दिमाग़ लगाए राग दरबारी अलापने का अवसर आता है तो ये बेअक्ल लोग अपनी तान छेड़ देते हैं। अपने इमोशन के लूशमोशन को सम्हालते हुए हरिप्रसाद ने गडकरी को जोकर और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज देशभक्ति गीतों पर झूमने को बेशर्म बता डाला। इतना ही नहीं हरिप्रसाद ने लालकृष्ण आडवाणी को भी जिन्ना भक्त बताते हुए आड़े हाथों लिया।

गाँधी समाधि को श्मशान कह कर पूरे देश को बता दिया की कांग्रेस गाँधीजी का कितना और कैसा सम्मान करती है। गडकरी के बयान को गटर की राजनीति कहने वाले कुछ कहेंगे कांग्रेस के इस महासचिव के बयान पर। समाधि और शमशान मे बहुत फ़र्क है... ये इनको पता होना चाहिए।  

Sunday, 5 June 2011

उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक लड़ते रहो...


बाबा रामदेव के नेतृत्व में भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ रामलीला मैदान में जारी मुहिम के एक दिन पहले फाइव स्टार व्यवस्था को लेकर मीडिया में काफी चर्चा रही, लेकिन गर्मी से बेहाल भूखे पेट पसीना पोछते रिपोर्टरों को देखकर सारे चैनलों से फाइव स्टार का सगूफा गायब हो गया। वहीँ दूसरी तरफ अन्ना हजारे के आन्दोलन से रामदेव की मुहिम की तुलना करने वाले तथाकथित बुद्धजीवियों के चेहरे पर उस समय हवाईयां उड़ने लगी जब अनशन स्थल पर एक दिन पहले ही पचास हज़ार से अधिक लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा।

इस अनशन की सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह रही कि रामदेव की आगवानी करने कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के चार-चार वरिष्ठ मंत्री हवाई अड्डे पर पहुँच गए। इससे कांग्रेस का कमीनापन उसी समय समझ में आ गया। साथ ही कांग्रेस के बड़बोले मनीष तिवारी और दिग्विजय सिंह जैसे सोनियां के चमचों को अपनी ही पार्टी के कुकृत्यों से शर्मिंदा होने का अवसर पहली बार देखने मिला। ऐसे में दिग्गी राजा को हिस्टीरिया का दौरा आना लाजमी था, सो उन्होंने रामदेव के बारे में कसीदे कसना शुरू कर दिया। 
 
इस दौरान अनशन की हवा निकालने में जुटी शर्मनिरपेक्ष ताकतों और बिके हुए मीडिया घरानों का पहला निशाना बनी बाबा रामदेव के मुहिम का समर्थन करने मंच पर पहुंची ऋतम्भरा... जिनके ऊपर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाकर न्यूज़ रूम में बुद्धजीवियों और समाज सेवियों का एक पैनल चर्चा करने में जुट गया। सेकुलरिज्म का चश्मा पहने इन महान विभूतियों की पारदर्शी नज़र में अन्ना हजारे के मंच पर नक्सलियों का दलाल अग्निवेश समाज सेवी दिखता है और वात्सल्य ग्राम वाटिका में अनाथ बेसहारा बच्चों को सहारा देने वाली साध्वी साम्प्रदायिक।

अन्ना और रामदेव की मुहिम के दौरान एक अंतर और देखने को मिला। अन्ना के मुहिम को फ़िल्मी जगत के बड़े-बड़े निर्माता निर्देशकों और अभिनेताओं से लेकर एलीट वर्ग तक का समर्थन मिला....जबकि रामदेव को देश के किसान, मजदूर और माध्यम वर्गीय लोंगों का साथ और आत्मविश्वाश मिला। लेकिन इतना जरुर है कि बाबा की आलोचना शाहरुख़ खान और सलमान खान जैसे देश भक्त कलाकारों ने की। एक तरफ अन्ना हजारे के मंच पर चौबीसों घंटे प्रख्यात वकील (दलाल) शांति भूषण, एनजीओ किंग अरविन्द केजरीवाल और किरण वेदी समेत सिविल सोसाईटी के नुमायिंदे नज़र आ रहे थे तो राम देव के मंच पर संत और विभिन्न धर्म के गुरु नज़र आ रहे थे।

अब बात करतें है असली ड्रामे की.... शांति पूर्वक चल रहे अनशन में उस वक्त अशांति फैली जब केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री कपिल सिब्बल ने प्रेस कांफ्रेंस कर पत्रकारों को रामदेव के साथ हुए तथाकथित समझौते की चिठ्ठी पढकर सुनाई। रामदेव से सरकार के साथ हुए समझौते की बात देर रात तक मीडिया में सुर्खिया बनी रही। सरकार की सफलता और अनशन की विफलता की बात सोचकर कई कांग्रेस भक्तों के चेहरे की लालिमा अचानक ही बढ़ गयी। उनके चेहरे की दिगविजयी मुस्कान छुपाये नहीं छुप रही थी। लेकिन इस वक्त एक प्रश्न जो सबकी जेहन में था वो था सरकार की चतुराई भरी रणनीति।

अचानक आधी रात को रामलीला मैदान में रामण लीला का दृश्य कहा से उभर कर आने लगा। अपने काले कारनामों और नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए सरकार के इशारे पर करीब पांच हज़ार से भी अधिक पुलिस के जवानों ने रात के दो बजे रामदेव सहित सभी सत्याग्रहियों को घेरकर बर्बरता पूर्वक पीटना शुरू कर दिया। इसके बावजूद भी जब अनशनकारी नहीं हटे तो पंडाल में आग लगाकर आंशू गैस छोड़े गए। अपनी बर्बरता का नमूना पेश करते हुए पुलिस वाले बाबा रामदेव को बेरहमी से खीचते हुए उठा ले गए। रामलीला मैदान में दो दिनों से भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम में उमड़े जनसैलाब की भावनावों के साथ जिस तरह पुलिस वालों ने बलात्कार किया उसका उदहारण भारतीय लोकतंत्र को शर्मशार करने के लिए नाकाफी है।

देश में इतनी बड़ी घटना हो गयी...इस दौरान जिस कांग्रेस त्रिगुट (सोनिया, राहुल और मगनमोहन) के इशारों पर यह सत्ता के लोभ में गन्दा खेल खेला जा रहा है उनकी तरफ से अभी भी कोई बयान नहीं आया। इससे यही लगता है कि इस देश में रामदेव जैसे लोगों की जगह नही है यहाँ अलगाववादियों और नक्सलवादियों द्वारा किए गये विरोध को ही तबज्जो दी जाती है। क्या आने वाले समय मे लोग आतंकवादियों, नक्सलवादियों का समर्थन कर अपनी माँग मनवाने के बारे मे सोचेंगे? जिस तरह से रामदेव को प्रताड़ित करने साजिश की गई है उससे तो यही लगता है। लोकतंत्र का तो गला घोटा गया है और केंद्र सरकार को कोई अफ़सोस नही है, उल्टा रामदेव को ठग कह रही है।

आखिर भ्रष्टाचार और काले धन के मामले पर सत्ता में बैठे राजा-रानी और युवराज़ जनता की भावनाओं को कब तक कुचलेंगे। कब तक हम अन्ना और रामदेव रूपी बैसाखी के सहारे इनसे लड़ते रहोगे। उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक लड़ते रहो....

अवनीश सिंह

Tuesday, 24 May 2011

क्या हो गया है प्रधानमंत्री को...


जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार आई थी तब वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम ने पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार का आभार व्यक्त किया था कि उन्हें विरासत में एक मजबूत अर्थव्यवस्था मिली है। यह कथन इतना बड़ा सच था कि सिर पर चढ़कर बोलता था। वरना कांग्रेस के मंत्री किसी दूसरे को श्रेय दें, ऐसा कम ही होता है। लेकिन यही सरकार अब सुरसा की तरह बढ़ती महंगाई और उसे रोकने की नाकामी अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को नाकारा साबित कर रही है। क्या हो गया है हमारे देश के उत्कृष्ट प्रधानमंत्री को! क्या वे किसी अदृश्य ताकत के हाथों की कठपुतली तो नहीं बन गए हैं... ऐसे असहज सवाल शंका के आधार पर लोगों के जेहन में कुलबुला रहे हैं और सरकार अपनी दूसरी पारी का दो वर्ष पूरे करने की ख़ुशी में इतरा रही है।

वहीं दूसरी तरफ स्वच्छता का आवरण ओढ़े माननीय मनमोहन सिंह देश की जनता को अपनी साफ़-सुथरी पगड़ी (छवि) दिखाने में मशगूल हैं। लेकिन कहां-कहां सरकार बचेगी....लोग तो अब खुलकर कहने लगे हैं कि देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार सहित विपक्ष के कुछ नेताओं ने विदेशों में कालेधन जमा करा रखे हैं। ऐसी अवस्था में देश सच्चाई जानना चाहेगा। भ्रष्टाचार के शिष्टाचार में लाचार सत्ता की कमान संभाल रहे ये लोग लोकप्रतिनिधि हैं, वे जनता के प्रति जिम्मेदार हैं। फिर जनता को अंधकार में क्यों रखा जा रहा है... क्यों कभी अन्ना हजारे को तो कभी बाबा रामदेव को अनशन और आन्दोलन करने पड़ रहे हैं। पूरा तंत्र सिर्फ आम आदमी की कीमत पर अपनी जेब भरने में लगा है। फिर चाहे वो कांग्रेस की प्रयोगशाला के भ्रष्टाचार रूपी परखनली से निकले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हाण हों या फिर सुरेश कलमाडी। ए राजा हो या करुणानिधि की बेटी कनिमोड़ी।

भारत में जैसे जैसे भ्रष्टाचार का मुद्दा गर्माता जा रहा है, राजनेताओं की छिछालेदार सामने आ रही है, आश्चर्य तो तब होता है जब भारत की राजनीति के प्रेम चोपड़ा कांग्रेस महामंत्री दिग्विजय सिंह हर उस व्यक्ति के कपडे उतारने लग जाते हैं, जो भी भ्रष्टाचार के विरूद्ध अपनी आवाज उठाता है और पूरी कांग्रेस पार्टी में एक भी ऐसा नेता नहीं है जो उनसे कहे कि वे अपना अर्नगल प्रलाप बंद करें। तो क्या यह नहीं माना जाना चाहिये कि दिग्विजय सिंह 10 जनपथ के इशारे पर ये सब हरकतें कर रहे हैं। समझ में नहीं आता कि वे किसके सामने अपनी निष्ठां दिखाना चाहते हैं। सोनिया गाँधी के प्रति या भारत के प्रति।

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि आजादी के इतने बरसों के बाद भी देश में लंबे समय तक शासन का अनुभव रखने वाली कांग्रेस सरकार को अभी तक यह समझ में नहीं आया है कि भ्रष्टाचार से कैसे निपटा जाए। कॉमनवेल्थ घोटाला, आदर्श घोटाला, टेलीकॉम घोटाला और स्पैक्ट्रम घोटाला... एक के बाद एक महाघोटाले ने सरकार के सामने संकट खड़ा कर दिया है। वो तो भला हो इस देश की न्यायपालिका का जिसने थोड़ी ईमानदारी का परिचय देते हुए बेईमान कलमाड़ी और राजा-रानी (ए. राजा, कोनीमोझी) जैसे देश के दलालों को सलाखों के पीछे पहुंचाकर स्थिति को थोडा संभाल लिया। इन मामलों में केंद्र सरकार को न तो कोई रास्ता सूझ रहा है और न ही कड़े फैसले करने की हिम्मत दिख रही है। ये अलग बात है की सरकार न्यायालय की इस करवाई का श्रेय अपने ऊपर लेकर अपनी पीठ अपने ही हाथ ठोंक ले।

कहने को तो केंद्र में कांग्रेसनीत त्रिगुट (सोनिया, राहुल और मनमोहन) सरकार ने अपनी दूसरी पारी के दो वर्ष पूरे कर लिए हैं लेकिन इन दो वर्षों में इन्होंने देश की लाचार जनता की भावनावों के साथ किस प्रकार बलात्कार किया यह बात किसी से छुपी नहीं है। मंहगाई के कारण पस्त जनता के ह्रदय से निकली अंतर्वेदना से भी इन सत्ताशीन नेताओं का ह्रदय द्रवित नहीं हुआ, और अपनी नाकामी को छिपाने के लिए ये नेता दिल्ली में गठबंधन धर्म की दुहाई देते हुए जश्न मना रहे हैं। अच्छा तो यह होता कि विश्व  के सबसे बड़े लोकतंत्र का दंभ भरने वाले राजनेता भ्रष्टाचार पर देश भर में चल रही बहस को देखते हुए इस मुद्दे पर संसद में बात करते, और जनता को यह विश्वास  दिलाते कि भारत के राजनीतिक दल भी भ्रष्टाचार को जड़मूल से समाप्त करने के लिए कृतसंकल्पित हैं।

आज जनता जब महंगाई, भ्रष्टाचार, लूट खसोट के सारे इतिहास पलट कर देखती हैं तो अपने आप को सबसे ज्यादा लुटा हुआ इसी सरकार के कार्यकाल में पाती हैं। दान में मिली सत्ता से मनमोहन सिंह जी को अगर जरा भी अपनी साख बचानी हैं तो इस्तीफ़ा दे देना चाहिए... वर्ना इतिहास कहेगा की "इस देश में एक ऐसा प्रधानमंत्री था जिसे एक महिला ने कठपुतली की तरह नचाया....." अब तो प्रधानमंत्री के बारे में यह अवधारणा बन चुकी है कि इस सरकार को कोई अदृश्य शक्ति चला रही है। वह संवैधानिक दृष्टि से संसद के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन वस्तुतः वह सोनिया गांधी के प्रति उत्तरदायी हैं। आजादी के बाद इतना कमजोर प्रधानमंत्री शायद किसी ने देखा हो, जिसका अपनी सरकार के काम-काज पर ही नियंत्रण नहीं है। यह भी तय है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में माननीय मनमोहन सिंह सबसे भ्रष्ट सरकार के अगुआ के ख़िताब से नवाज़े जायेंगे।
आप इस संदिग्ध सच्चाई को स्वीकरिए या धिक्कारिए...लेकिन नकार नहीं सकते।

अवनीश सिंह                                                20 may 2011
9555736564

Saturday, 21 May 2011

भारतीय राजनीति के विचित्र चरित्र


भारतीय राजनीति के तीन किरदार मुझे भुलाये नहीं भूलते, या यूँ कहिये मैं उन्हें भुलाना नहीं चाहता। इनमें पहला नाम राजद सुप्रीमो लालू का आता है...जो एक दशक पहले अपनी बेबाक बयानबाज़ी के लिए मिडिया से लेकर आमजन तक काफी चर्चा में रहते थे। सुनने में आ रहा है की आजकल उनके राजनीतिक तबेले में रावडी देवी के अलावां कोई नहीं बचा है। इस बीच राजनीति में पुनर्वापसी को लेकर लालू ने जय-बीरू के अंदाज़ में पासवान के साथ शोले का रीमेक भी बनाने की कोशिश की जो बुरी फ्लाप हो गयी। दोनों नेताओं ने कहा था कि बिहार में लालू पासवान की आंधी बहने लगी है मगर नीतीश-मोदी के तूफान में वे दोनों ऐसे पटकाय गये कि अब मुंह लटकायें अपने-अपने घरों में बंद हैं।

इस क्रम में दूसरे नंबर पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय का नाम है। जो इटलीपरस्त महारानी के प्रति अपनी वफादारी का सबूत देने के लिए तलवे चाटते हुए कुत्तों को भी शर्मसार कर रहें हैं। महोदय की बेबाकी और खोजी खुलासों ने विक्किलिक्स के संथापक जुलियन अन्साज़े को भी पीछे छोड़ दिया है। आजकल अपनी बयानबाज़ी के कारण इन्हें दिग्गिलिक्स के भी नाम से जाना जा रहा है। हिंदुत्व को गरियाना हो या भाजपा को लतियाना हो दोनों काम आजकल कांग्रेस ने इन्हीं के मजबूत कन्धों पर सौंपा है। इनकी धर्मनिरपेक्ष छवि ऐसी है कि बटाला हॉउस इनकाउन्टर से लेकर ओसामा के मरने तक इनकी दरियादिली मिशाल बन चुकी है। वैसे दिग्विजय के संदर्भ में इस बात की भी खूब चर्चा चलती है कि मुस्लिम मतों को बटोरने के लिए सोनिया गांधी ने उनको मुक्त-हस्त कर दिया है। हो सकता है कि इन्हें अपनी मुस्लिमपरस्ती के कारण भविष्य में लाहौर से सांसद बनने का आफर भी मिल जाये। 

तीसरे नंबर पर हमारे पडोसी और हालत के मारे अमर सिंह हैं। सड़क छाप शायरी और अमर प्रोडक्शन की सीडियों से इन्होंने मिडिया में बहुत नाम कमाया है। समाजवादी पार्टी से लतियाकर निकले गए अमर बाबू हमेशा किसी न किसी प्रसंगवश चर्चा में बने रहते हैं। यहाँ तक की वो खुद अपने उपर दलाल का ठप्पा लगवाना पसंद करते हैं। राजनीति से लेकर कार्पोरेट तक सोनिया से लेकर सिने जगत की महान हस्तियों के लिए इन्होंने लम्बे समय तक दलाली का काम बड़ी ही ईमानदारी से निभाया है। इसी महानुभाव ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के सिविल सर्वेंट भूषण परिवार की सीडी लांच कर अन्ना हजारे की मुहिम की हवा निकला, जिसके लिए देश की जनता इनकी आभारी है। अपनी करतूतों की वज़ह से अमर सिंह लोकतंत्र मे गंदगी फैलाने वाले इतिहास के पन्नो मे "अमर" पात्र के रूप मे मौज़ूद रहेंगे, यह तो निशित रूप से तय है।

अब होनी को कौन टाल सकता है। बेचारे अमर बाबू आजकल अपने टेप को लेकर चर्चा में बने हैं। वैसे, एक तरह से अमर सिंह इस तरह की सिचुएशन पसंद भी करते हैं, जहां कुछ विवाद हो और बयानबाजी जम कर हो। इस विवादास्पद टेप में अमर सिंह और बिपाशा नाम की एक महिला से बातचीत का रिकॉर्ड है। लोग यह मान रहे हैं यह आवाज 9 साल की दोस्ती के बाद जॉन अब्राहम से अलग हुई 32 साल की बॉलिवुड ऐक्ट्रेस बिपाशा बसु की है।

वहीं, अमर सिंह कह रहे हैं, जहां तक सफाई देने की बात है, वह मैं अपनी बीवी के अलावा और किसी को सफाई नहीं दूंगा। कहने को तो अमर सिंह सांसद है लेकिन इस मामले में जबाब सिर्फ पत्नी को देंगे...जनता गयी तेल लेने। अमर सिंह कि पत्नी इस दलाल की बीबी होने के गम में पहले ही रोती थी, अब तो सौतन बिपासा भी आ गई। सच कहा जाये तो अमर सिंह जैसा होनहार दलाल सौ सदी में एक बार पैदा होता है। अमर सिंह यह तो मानते हैं कि टेप में जो मेल-वॉयस है, वह उन्हीं की है, जब आवाज़ उनकी है तो जाहिर है दोनों टांगों के बीच के दर्द की कशिश भी उन्हीं की होगी। पर उनका कहना है कि मैं कोई साधु नहीं हूं, पर शैतान भी नहीं हूं, जैसा कि मुझे पेश किया जा रहा है। ये तो पता नही की आप संत है या शैतान लेकिन दलाल ज़रूर है।
यदि इन नेताओं का यही रवैया रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जनता उनको एक स्वर से मानसिक दिवालिया घोषित कर देगी।

अवनीश सिंह 

Saturday, 14 May 2011

लाल किला दरक गया, भ्रष्टाचार की सत्ता सरक गई

बदलाव की बयार में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की सत्ता बदल गई है। केरल और पश्चिम बंगाल में लेफ्ट का लाल किला दरक गया, तो तमिलनाडु और पुडुचेरी में डीएमके-कांग्रेस की सत्ता सरक गई। असम ही एक ऐसा सूबा रहा जो बदलाव की बयार में अछूता रह गया। पांच राज्यों की विधान सभा के रिजल्ट से यह साफ हो गया है कि भारतीय मतदाता भ्रष्टाचार को अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। मतदाताओं ने यह साफ तौर पर यह संदेश भी दिया है कि अगर वोट पाना है तो काम करना पड़ेगा।

तमिलनाडु के नतीजे यह बताने के लिए काफी हैं कि मतदाता भ्रष्टाचार को अब और सहने के मूड में कतई नहीं हैं। डीएमके के कई नेता पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। यहां तक कि भ्रष्टाचार के छींटे करुणा के घर तक पहुंच गए और बेटी कनिमोझी पर गिरफ्तारी का खतरा मंडरा रहा है। पार्टी के बड़े नेता और पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जेल में हैं। इन सब कारणों से भ्रष्टाचार चुनाव का अहम मुद्दा बन गया और करुणानिधि के नेतृत्व वाली डीएमके की बहुत किरकिरी हुई। अगर डीएमके की जीत हो जाती, तो यूपीए को यह कहने का मौका मिल जाता कि जनता की नजर में वह बेदाग है। जनता ने यह मौका उससे छीन लिया। मतदाताओं ने इसकी सजा करुणानिधि सरकार को दी और इस बार के चुनाव में जयललिता की पार्टी को शानदार बहुमत मिला।

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव परिणामों ने साफ़ कर दिया कि अब वामपंथी विचारधारा का जमाना बीत गया। जनता ने सबके लिए एक अजेंडा तय कर दिया है: काम करो। वोट उसे मिलता है जो काम करता है या जिससे काम करने की उम्मीद की जा सकती है। इन चुनावों का यही सबसे बड़ा सबक है। बंगाल ने लेफ्ट को 34 साल तक आजमा कर देख लिया। अब उसे तरक्की चाहिए, जिसका वादा ममता बनर्जी कर रही हैं। पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद पहली बार वाम मोर्चा को विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। ममता की आंधी में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। 294 विधानसभा सीटों के लिए हुए चुनाव में तृणमूल- कांग्रेस गठबंधन ने सत्ताधारी लेफ्ट फ्रंट को करारा झटका देते हुए दो-तिहाई बहुमत हासिल किया।

बंगाल में लेफ्ट ने बरसों तक बदलाव की हवा को रोके रखा। उसने राज्य के हर कोने में ऐसा जाल फैला दिया, जिसे उधेड़ना मुश्किल था। राज्य की युवा पीढ़ी अपने लिए एक खुली जगह की तलाश कर रही थी। बसु के बाद वहां सीपीएम की नीतियों को बदलने की बात सोचने वाले बुद्धदेव भट्टाचार्य की रफ्तार इतनी धीमी थी कि बदलाव की आकांक्षा का दबाव पार्टी झेल नहीं पाई। इसके ठीक उलट, ममता का अपने बूते पर खड़ा होना और इस पुराने निजाम को चुनौती देना युवाओं को आकर्षित करने वाला साबित हुआ। इसके बाद सिंगूर और नंदीग्राम ने आग में घी का काम किया। ममता ने भूमि अधिग्रहण को लेकर लोगों की नाराजगी को समझा और वह गांववालों व किसानों की आवाज बनकर उभरी। तृणमूल कांग्रेस ने इन मौकों का भरपूर फायदा उठाया और खासकर ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत की।

कुल मिलाकर इतना कहा जा सकता है कि तमिलनाडु में जहां इन चुनावों में भ्रष्टाचार सबसे बढ़ा मुद्दा था और यूपीए जिस तरह जयललिता की आंधी में उड़ गया है, उससे ममता बनर्जी के कंधों पर सवार होकर बंगाल का किला जीत लेने की उसकी सफलता की चमक जरूर मद्धिम पड़ गयी है। वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में ‘लाल किला’ ढह जाने और केरल में कांटे की टक्कर के बावजूद सत्ता गंवा देने के बाद लेफ्ट फ्रंट, खासकर उसकी अगुआ पार्टी सीपीएम को अब राष्ट्रीय राजनीति में अपने वजूद के सवालों से रू-ब-रू होना पड़ेगा। पहली बार लेफ्ट इतना बेदम हुआ है कि बंगाल और केरल दोनों जगह से उखड़कर त्रिपुरा में जा सिमटा है। हाल के बरसों में लेफ्ट तीसरे मोर्चे के नाम पर कांग्रेस और बीजेपी को डराता आया है। उसका वह हथियार अब कमजोर हो जाएगा। देश की राजनीति में अलग समीकरण बनेंगे।

केरल में कांग्रेस के नेतृत्व में यूडीएफ को मामूली बहुमत मिला। वैसे, तो केरल में हर बार सत्ता परिवर्तन होता है लेकिन इस बार सीपीएम के नेताओं ने अपनी हार की कहानी खुद लिखी। मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन और केरल से पार्टी के बड़े नेता व पोलित ब्यूरो के सदस्य विजयन आपस में ही लड़ते रहे। पार्टी में कलह का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि अच्युतानंदन का नाम प्रत्याशियों की लिस्ट में शामिल ही नहीं था। बाद में जब उनके समर्थकों ने हंगामा किया, तो उन्हों उम्मीदवार बनाया गया। इसके अलावा पार्टी के कुछ नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे।

असम में तरुण गोगोई से अमन-चैन की उम्मीद है, इसलिए असम में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई है। राज्य के 76 वर्षीय मुख्यमंत्री तरुण गोगोई तीसरी बार सत्ता संभालने की तैयारी में हैं। जनता को काम करने वाले लोगों पर भरोसा है, इसीलिए राज्यों में नेताओं का निजी करिश्मा चल निकला है। गुजरात में मोदी और बिहार में नीतीश पहले ही इस बदलाव की नुमाइंदगी कर चुके हैं।

पुड्डुचेरी में पूर्व मुख्यमंत्री एन. रंगासामी के नेतृत्ववाले ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस (आआईएनआरसी) एवं ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) गठबंधन ने दो तिहाई बहुमत हासिल किया है। यहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को नुकसान उठाना पड़ा है। ज्ञात हो कि पूर्व मुख्यमंत्री एन. रंगासामी ने दो महीने पहले कांग्रेस से अलग होकर फरवरी में ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस नाम से पार्टी बनाकर विधानसभा चुनाव में जबर्दस्त जीत हासिल की है। उनकी इस कामयाबी ने कांग्रेस के तीसरी बार सत्ता में काबिज होने के मंसूबों पर पानी फेर दिया है

इन चुनाव परिणामों पर विचार करते समय हमें आंध्र प्रदेश और कर्नाटक हुए उपचुनाव परिणामों को नहीं भूलना चाहिए, जहां कांग्रेस को करारी मात मिली है। कर्नाटक के उपचुनावों में जहां भाजपा ने जीत दर्ज करके अपनी दमदार उपस्थिति का अहसास कराया तो पूर्व मुख्यमंत्री और स्वर्गीय वाईएसआर रेड्डी के बेटे जगनमोहन ने कडप्पा में जीत दर्ज करके कांग्रेस के लिए नई चुनौतियों का संकेत दिया है। दक्षिण के राज्य में भाजपा की उपस्थिति कांग्रेस के लिए चिंता का सबब बन सकती है तो आंध्र प्रदेश में जगनमोहन का जादू नया समीकरण खड़ा कर सकता है। 

Tuesday, 3 May 2011

अमेरिकियों में बदला लेने की भावना तो है


कल दिनभर समाचार चैनलों पर एक खबर चल रही थी। अमेरिका ने पाकिस्तान के ऐबटाबाद शहर में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मार गिराया। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के 10 साल बाद अमेरिका ने अपना बदला लिया। यह अमेरिकी सरकार और उसकी जनता की बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। इसके पीछे कारण जो भी हो लेकिन इस बात की सराहना और तारीफ तो करनी ही चाहिए कि अमेरिकियों में बदला लेने की भावना तो है ही।
इसके विपरीत भारत में धर्मनिरपेक्ष बनने की होड़ में देश की दशा-दिशा तय करने वाले तथाकथित बुद्धजीवी और हमारे नेताओं की सोंच सहिष्णु है, इनमें गांधीवादी विषाणु इस कदर घुसे हैं कि बदला लेने की भावना तो दूर अगर इनके एक गाल पर तमाचा लगे तो ये झुकर अपना पिछवाड़ा भी खोलने को तत्पर रहते हैं, उस पर अगर केंद्र में बिना रीढ़ की इटलीपरस्त सरकार हो तो क्या कहा जा सकता है।
आज समाज के नीति निर्णायक तत्व जिसका मुख्य पेशा केवल जनता के धन को लूट कर विदेशी बैंकों में जमा करना है, उनसे विकास और आत्मरक्षा के माडल पर बात करना बेमानी है। जिस देश में देशद्रोहियों को दामाद बनाकर रखा जाता हो भला उस देश से कौन डरने वाला है। आज हमारे ही टुकड़ों पर पलने वाला पाकिस्तान हमें ललकारता रहता है और पड़ोस मे बैठा चीन धमकाता रहता है। लेकिन सरकार अपनी स्वच्छ छवि के चक्कर में देश की जनता के भावनावों के साथ बलात्कार करने में लगी हुयी है। न तो इस देश के नेताओं में रत्तीभर स्वाभिमान बचा है और न ही देशप्रेम।
भारतीय राजनीति को अपने बाप की बपौती समझने वाले नेता और मंत्री, अम्मा, अप्पा, बहन और बहनोई को टेलिकॉम का लाइसेँसे देने के लिए अरबों रुपये लूटने में लगे हैं। कृषि मंत्री प्याज, चीनी, गेहूँ के दाम बढवाने, क्रिकेट खेलवाने, और बलवा के साथ के साथ घूमने में लगा है तो कोई आदर्शवादिता का परिचय देते हुए अपने रिश्तेदारों को फ़्लैट आवंटित करने में लगा है।
ये भारतवासी भी अजीब लोग हैं। पहले तो एक नपुंसक को प्रधानमंत्री बनाते हैं और फिर उससे बड़ी बड़ी उम्मीद पालने लगते हैं। अभी-अभी दिग्विजय का बयान नही देखा... देखिए कितने बेकरार है हमारे उदार, मानसिंह की पीढ़ी के वारिस जनाब दिग्विजय, लादेन का शाही अंतिम संस्कार करने के लिए। इनका बस चलता तो ये समुद्र में गोता लगाकर लादेन की लाश ढूंढ़ निकलते और विधिवत अंतिम संस्कार कर धर्म निरपेक्ष होने का अंतर्राष्ट्रीय पदक अपनी झोली में झटक लेते।
वो तो लादेन की बदकिस्मती थी जो वो पाकिस्तान मे जा छिपा और मारा गया, कहीं वो भारत आ गया होता तो किसकी मजाल थी जो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश और कांग्रेस जैसी शर्मनिरपेक्ष सरकार के रहते आँख उठाने की भी हिम्मत करे। उसकी मुकदमे की फाइल/सज़ा की फाइल होम मिनिस्टीरी से दिल्ली सरकार और दिल्ली सरकार से राष्ट्रपति भवन और वहां से पी. एम. ओ. ऑफीस और वहां से वापस फिर से दिल्ली सरकार......के बीच इतना घूमती की लादेन की तो छोड़ो उसकी अनेकों पीढ़िया अपना भरपूर जीवन यापन कर भारत की धर्मनिरपेक्षता को मजबूती प्रदान करती। आख़िर होना भी चाहिए ऐसा हम एक धर्मनिरपेक्ष और उदार देश के नागरिक जो ठहरे, जिसे गांधीवादी सहनशीलता और अहिंसा रूपी कायरता की कुछ ज़यादा ही खुराक दी गयी है।
अवनीश सिंह

Friday, 29 April 2011

ये शीला सलमान खान वाली नहीं कांग्रेस वाली हैं...


इस वर्ष दिल्ली में रहते हुए सबसे चर्चित जो शब्द सुनने में आया वो था शीला...। शीला की चर्चा दो कारणों से अधिक हुयी, पहला कारण तो 'शीला की जवानी' था लेकिन लोग दूसरा कारण खुल कर नहीं बताते हैं। एक दिन एक सज्जन ने दबे हुए स्वर में कहा की अब तो शीला भी बदनाम हो गयी। जब मैंने अपनी स्मृतियों पर जोर डाला तो जो तथ्य सामने आया उस हिसाब से तो मुन्नी को बदनाम होना था.. फिर शीला कैसे बदनाम हुयी ?
मेरा दिमाग घूम फिरकर मुन्नी और शीला पर इसलिए जा रहा था क्योंकि इन दो नामों की इन दिनों बड़ी जबरदस्त चर्चा थी। हर गली और हर गावं में इनकी जवानी और बदनामी के किस्से आम हो चुके थे। मुन्नी जबसे बदनाम हुयी तो झंडुबाम भी बेचने लगीं थीं। जबकि शीला को अपनी जवानी पर घमंड आ गया था। वह हर चैनल में अपनी जवानी की विशेषताओं को बताते फिर रही थीं। लेकिन इन सबके बीच तीसरी किसी बात पर मेरा ध्यान ही नहीं जा रहा था।
थोड़ी देर बाद उस महोदय ने स्वतः बताया कि दिमाग पर अधिक जोर डालने कि आवश्यकता नहीं है..ये शीला सलमान खान वाली नहीं कांग्रेस वाली हैं जो दिल्ली की मालकिन हैं। फिर याद आया कि देश की राजधानी में यही इटलीपरस्त कांग्रेसी सत्ता की मालकिन शीला दीक्षित हैं जो भ्रष्टमंडल खेलों को राष्ट्र की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए खेल के नाम पर देश के गरीबों और किसानों के पैसों को पानी की तरह बहाने में तनिक भी संकोच नहीं की। राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर नेता अपनी जेबें भरते रहे और जनता लोक लुभावन होर्डिंग्स और विज्ञापनों को देखकर संतोष करती रही। जनता का क्या है यह तो एक तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना छाप अनशन का समर्थन करेगी और दूसरी तरफ देश की तरक्की का मूल-मंत्र गाँधी-नेहरू को बताने वाले कांग्रेस को वोट देकर राजसत्ता पर काबिज कराने के अभियान में लग जाएगी। भले ही वही नेता सत्ता में रहते हुए जनता की भावनाओं के साथ बलात्कार करने में जुटें हों!!
बात भ्रष्टाचार पर निकली है तो दूर तलक अवश्य जाएगी, भले ही राष्ट्र के स्वाभिमान को ताख पर रखकर देश की सर्वोपरी सत्ता संसथान की महारानी के तलवे चाटने वाली जाच एजेंसियों को थोड़ी बहुत नौटंकी करनी पड़े। इस दस दिन की अय्याशी के लिए जिस तरह देश कि जनता के साथ बलात्कार किया गया,  दुनिया के इतिहास के इस सबसे बड़े घोटाले का सही ब्योरा तो शायद ही कभी आये। लेकिन सिर्फ लूट के मकसद से आयोजित इस खेल का खमियाजा जिस-जिस को उठाना पड़ रहा है, उसकी आह भी शायद किसी को न सुनाई दे।
अभी पिछले दिनों राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हुई अनियमितता में राज्य सरकार के शामिल होने के आरोपों का सामना कर रहीं असंदिग्ध सांस्कृतिक सूझ-बूझ, सुरुचि और संस्कारों से लैस दिल्ली की माननीया मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने स्पष्ट कहा कि उनकी सरकार इस मामले में पाक-साफ होकर निकलेगी। आशय साफ़ है कहा जाता है कि 'जाको राखे साईयां मार सके न कोई' लेकिन इसी दोहे को दिल्ली की राजनीतिक भाषा में कहा जाता है 'जाको साथे सोनिया............'जिनके उपर इटली की महारानी और युवराज का हाथ हो उसका कोई क्या बिगाड़ पायेगा।
सीबीआई द्वारा राष्ट्रमंडल घोटाले में भ्रष्टाचार के सबसे बड़े प्रतीक बने कलमाड़ी का कॉलर पकड़े जाने के बाद अब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर सवाल उठ रहे हैं। यह राष्ट्रमंडल खेल किस तरह भ्रष्ट कारनामों की एक गंगा लेकर आया, जिसमें समूची शीला सरकार ऊब-डूब रही है। करीब साढ़े सात सौ करोड़ रुपये का वह धन राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों के मद में घुसा दिया गया जो दलितों के विकास के लिए था। पिछले महज दो सालों से जिन लोगों की निगाह दिल्ली और दिल्ली के बाजार पर होगी, वे जानते होंगे कि शीला दीक्षित की सांस्कृतिक सूझ-बूझ, सुरुचि और संस्कार किसको-किसको निगल कर किसको समृद्ध बना रहे हैं।
किसी भी देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के किसी भी आयोजन का मेजबान बनना कई मायनों में महत्त्वपूर्ण और बहुत हद तक आर्थिक रूप से फायदेमंद भी साबित होता है। किंतु इसके साथ ही इस मुद्दे के कुछ अन्य बहुत से महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान देना भी जरूरी हो जाता है। जिस देश में अब भी सरकार बुनियादी समस्याओं से जूझ रही हो, अपराध, आतंकवाद और भ्रष्टाचार जैसी जाने कितनी ही मुसीबतें सामने मुंह बाए खड़ी हों, जिस देश को आज अपना धन और संसाधन खेल, मनोरंजन जैसे कार्यों से अधिक ज्यादा जरूरी कार्यों पर खर्च करने की जरूरत हो, वह विश्व में सिर्फ अपनी साख बढ़ाने के लिए ऐसे आयोजनों की जिम्मेदारी उठाने को तत्पर हो तो आप इसे किस नजरिये से देखेगे।
कलमाडी की नाटकीय गिरफ्तारी के माहौल के बीचगृह मंत्रालय द्वारा दिल्ली सरकार से शुंगलू कमिटी पर जवाब-तलब करना अनेक राजनीतिक सवालों को जन्म भी दे रहा है। लोग अब मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से कमिटी की रिपोर्ट पर जवाब कुरेदने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सीएम पूरी तरह आश्वस्त हैं। मुख्यमंत्री की आश्वस्तता ने साफ़ कर दिया है कि शीला को बदनाम करने के लिए विपक्षियों को अभी और पापड़ बेलने पड़ेंगे।